शीतल देसाई કી ગુજરાતી કહાની કે હિન્દી અનુવાદ

न्यू जर्सी के एक पॉश एरिया मे एक बड़ा स्टोर था, जिस के चमचमाते बोर्ड पर लिखा था:

‘वेलकम सुपर स्टोर’

‘कुरियर फॉर चेगन पठेल’

‘आयेम चेगन पठेल।‘

आगे ही काउंटर पर बैठे हेंडसम आदमी ने अमेरिकन शैली की अँग्रेजी मे उत्तर दिया।

कुरियर वाला ‘दिस इंडियन्स प्रोस्पर हियर लाइक एनीथींग’ ऐसा बडबडाता चला गया।

इंडिया के चानस्मा गाँव से आया पत्र देखकर ही छगन की आँखे विस्फारित हो गई।बिजली जैसी गति से उनके हाथ कवर के फ्लेप पे गए। पत्र खोलते ही वह चिल्लाया: ‘ अरी! मगन, देख तो सही।‘

स्टोर की दूसरी चोर से मगन की आवाज़ सुनाई दी: ‘इतना खुशी के मारे क्यूँ फुल गया? क्या है?

छगन दौड़ते हुए मगन के पास गया और पत्र उनके हाथ मे थमाया। दोनें की हँसी और शोर इनता तेज़ था कि स्टोर मे कार्य करते हुए सब लोग के हाथ थम गए।

‘ओहोहोहोहों.... जगना का मुन्ना इतना बड़ा हो गया क्या? जगना तो ससुर बन जाएगा...’ दोनों ने एक दूसरे को आलिंगन लगाया।

छोटे से गाँव मे यह तीनों लड़के- छगन, मगन और जगन तालाव के इर्द-गिर्द घूमते रहते थे। वहाँ नहीं जमा तो पहाड़ी पे चड जाते। शेष समय मे घर के आँगन मे पकड़-दाव खेलते रहते। यह त्रिमूर्ति सदा साथ ही रहती थी। रात सोने के वक्त ही अलग होते थे। बाप के हाथ पीट जाने के वावजूद तीनों गर्मी के दिनो मे तप्त मद्यान्ह मे भी तालाब के किनारे पहुँच जाते । तालाव मे स्नान करती भेंस पर सवार भी हो ते थे। छगन तो इतना मस्ती करता था कि दुनिया कि सबसे आलसु प्रजा या जाति –कभी नहीं उठने कि कसम खाकर आराम से बैठी हुई भेंस कि रानी भी झुँझलाकर पुंछ से वार करती। और खड़ा होने जाती थी। ऐसा होते ही उस पर सवार छगन गोल घूमते सीधा तालाव के पानी मे जा गिरता था। और तीनों दोस्त हँस- हँस के कमर से गोल हो जाते थे। मगन कई बार उसे रोकता:

‘इतनानी शरारत क्यूँ करता है? कभी वो शिंग मे उठाके पटक देगी। ’

‘जब होगा तब देखा जाएगा’ छगन बेपरवा हो कर मुस्कुराता ।

उसकी बेकिकराई जरूरत से ज्यादा लंबे समय के लिए चली और पिता को लगा की यह ज़िंदगी मे लड़का कुछ कर नहीं पाएगा, तो उन्हों ने दूर के रिश्तेदार केवहाँ विदेश भेजने की तैयारियां शुरू कर दी।

‘तू तो यार! नसीब अच्छा है। विमान मे उड़ेगा... छगना मुझे भी तेरे साथ आना है, पर...’

मगन ने भी सपने सजाये,किन्तु वह पराये परदेस जाने से डर रहा था।

‘पर-बर कुछ नहीं॥ आना चाहता है तो आ जाने का...’

और अपने छोटे से गाँव को ‘राम-राम’ कर के, जगना को गले मिल के दोनों उड़ चले और सीधे पहुंचे मामा के घर। मामा के स्टोर मे काम करने लगे। और कोई चारा ही नहीं था- इधर कौन सा तालाब ढूँढने जाए?

एक-दो महिने के बाद छगन ने धमाका किया- मुझे भी स्टोर चालू करना है।

‘पर....’. मगन कुछ कहने जा रहा था, पर उसने बोलने ही नहीं दिया।

मामा से थोड़े रुपये उधार लिये और ‘वेलकम स्टोर’ चालू कर दिया। मगन थोड़ा असमंजस मे था फिर भी अनिच्छा से तैयार हुआ। बस उस दिन से रात-दिन काम करता रहा और कभी पीछे मूड के देखा ही नहीं। हाँ, अब तो मामा भी अपने से आगे नीकल जाने वाले भानजे की प्रशंषा करते हंमेश करते रहते थे।

‘मैंने पहले से ही बोला था कि मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं है, फिर से सहाय करूंगा। तू बस साहस कर। मैंने तो पहले से ही लड़के का जुस्सा और खंत परख लिया था।

छगन के बड़े स्टोर मे मगन सब से बड़ा असिस्टेंट था।

‘तो हमारी टिकट निकलवा ले?’

‘रहने दे… बहोत खर्च होगा।‘

‘मै ले जाऊँगा। तू खर्च की फिक्र क्यूँ करता है?’

‘पर तू भी क्यूँ बेकार का खर्चा करे?’

‘बेकार? अरे, जगन के वहाँ जाना चे... ईधर पैसा,कारोबार सब कुछ है,पर जगन मिलेगा ईधर?’

मगन को उसका यह पागलपन-सनक अच्छा नहीं लगा।

‘तू हो आ उधर। मै यहाँ स्टोर सम्हालूँगा।

‘स्टोर की तूँ फिक्र मत कर...’

बीच मे ही मगन बोल उठा: तू जा के आ। मुझे आग्रह मत करना।

वह स्टोर के दूसरे कोने मे चला गया।

छगन ने तैयारियाँ चालू कर दी। अभी एकाध महीने मे तो पहुँच जाएगा गाँव अपने मादरे वतन इंडिया मे। अब की बार तो ठाठ से रहना है। इतना अच्छा कारोबार है, पैसे है, और अब तो स्टाईल भी है । बस लोग जैसे यहाँ रहते है उसी तरह सूट-बूट पहन के ही घूमना है। वोर्ड-रोब मे से अच्छे से अच्छे सूट निकाले गये और बेग मे रखे गये। कपबर्ड के आईने मे दिखाई देता उसका मुख मानों चमक रहा था। अब तो वर्ण भी निखरा था। और लक्ष्मी का तेज़ भी झलक उठता था।

‘हाँ, और... यू एस के लोगों की तरह ही रहूँगा... सब से साथ गंभीर रहकर ही बात करनी है। डिस्टन्स तो रखना पड़ेगा न? तभी जा के लोगों को पता चलेगा कि छगन कितना बड़ा आदमी है! सब को दिखा दूंगा।

पूरा गाँव छगन को लेने के लिए रेलवे स्टेशन पर जमा हुआ था। गाँव का बेटा ‘फोरीन’ से जो आ रहा था!

‘सुना है, वह बहोत बड़ा आदमी बन गया है।‘किसी ने कहा।

‘हा अब तो उस मे बदलाव आ गया होगा। शायद हमें पहचानेगा या नहीं?

‘वह बड़े बड़े लोगों को बार-बार मिलता रहता है।तो हमेंशा कोट-पेंट और टाई ही पहनता है।

‘हाँ और टाई पहनकर ही सोता है।‘

जगन ने वह मज़ाक करनेवाली की और कड़ी नज़र से देखा तो उस ने मुँह फेर लिया।लेकिन तब तक कोई एक बेचारे भोलेराम ने प्रतिभाव दे दिया था-

‘अच्छा! वाह! क्या बात है!’

रेलगाड़ी के आने कि आवाज सुनकर जगन, मुखिया और अन्य आगेवानों ने हार को पहनाके लिए हाथ मे गोल बना के रख दिया। कितने लोगों की द्रष्टि रेलगाड़ी के डिब्बे के दरवाजे पर स्थिर थी।

‘अरे, आओ... आओ... मुझे पूरा भरोसा था कि तूँ तो आयेगा ही। जगन ने दौड़ कर उसको गले लगा लिया। और इसी में हार पहनाना तो भूल ही गया!

‘हो...हो...हो’ छगन के ठहाके से पूरा प्लेटफॉर्म गूंज उठा। उसने बचपन की तरह ताली लगाई।

‘अहाहा...लाला चाचा अप तो बूढ़े हो गए!’

‘और तूँ गंजी-बनियन में से कोट-पतलून पर कैसे आ गया, लल्ला?

और फिर जुलूस चला जगन के घेर। शोर-गुल मचा गया। थोड़ी देर बाद किसी को ध्यान आया:

‘अरे! वह दोनों किधर गए? किसी को कुछ बताया भी नहीं...’ वह घर मे कहीं नहीं थे। सब ढूँढने लगे। छगन तो गायब था, पर शादीवाले घर से खुद दूल्हे का पिता गायब था!’ सब व्याकुल हो गए।

उसी समय जगन के पिताने अचानक कहा: ‘ तालाव के तीर तरफ जाओ... वहीं होंगे।‘

पिता का तजुर्बा सही निकला। घरवाले दोनों को तुरंत वापिस घर ले कर आए।

‘अरे घर पे शादी कि तैयारियाँ हो रही है और दोनों घूमने चले तालाव की और...ईतने बड़े हो गये, फिर भी अक्कल नहीं आयी क्या?’ बुजुर्गोकी नाराजगी दोनों के हास्य-हुल्लड़ मे डूब गई।

छगन पूरे सात दिन तक गाँव मे रहा। सब के घर जा के चाय-पानी कीया और हँसी-मज़ाक भी कीया। खेत,खलिहान,बागान हर जगह घूम लिया। जाते जाते गाँव की स्कूल के लिए दान देकर गया। सात दिन के बाद वह जब वापिस जा रहा था तब उस को विदा करने वाले टोले मे ऐसे भी कई थे जिन्हों ने छगन को पहली बार देखा था। रेलगाड़ी ने सिटी बजाई। सब ने उसे अलविदा कहा। छगन जहाँ तक उसकी नज़र पहुँचती थी तब तक खिड़की मे से हाथ बाहर रखकर हिला रहा था। वापिस लौटते हुए गाँव के बुजुर्ग छगन के बारे मे ही बातें कर रहे थे।

‘इतना सारा वक्त ‘फोरीन’ मे रहा...लाखों रुपये कमाया पर हमारे जैसा ही रहा... देहाती ...छगन तो बिलकुल ‘छगन’ ही रह गया ......’


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